ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है — कभी ख़ुशी, कभी तकलीफ़। दोनों ही अस्थायी हैं।

 ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है — कभी ख़ुशी, कभी तकलीफ़। दोनों ही अस्थायी हैं।

                              STORY



एक पहाड़ी के ऊपर एक अकेला पेड़ खड़ा था।


आधे साल तक वह पेड़ लाल फूलों से भर जाता था — पंछी उसके आस-पास गाते थे, लोग उसके नीचे बैठकर बातें करते थे, बच्चे खेलते थे। उसे लगता था जैसे पूरी दुनिया उससे प्यार करती है।


फिर आई सर्दी।

फूल गिर गए, पत्ते सूख गए, और पेड़ बिल्कुल अकेला रह गया। ठंडी हवाएँ चलती थीं, कोई उसके पास नहीं आता था। पेड़ सोचता — “शायद अब मेरा समय ख़त्म हो गया।”


एक दिन एक राहगीर वहाँ से गुज़रा। उसने रुककर पेड़ को देखा और धीरे से कहा,

“तुम पहले भी सुंदर थे... और फिर से होगे।”


पेड़ के मन में जैसे कोई उम्मीद जागी। उसे समझ आया — ऋतुएँ बदलती हैं, पर जड़ें वही रहती हैं।


समय बीत गया, और जब फिर से बसंत आई, उसके लाल फूल पहले से भी ज़्यादा चमकने लगे।


सीख: ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है — कभी ख़ुशी, कभी तकलीफ़। दोनों ही अस्थायी हैं।

बस अपनी जड़ों — अपने मूल्यों और अपने विश्वास — को मज़बूत रखो। 🌸

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